Mobile Se Hone Wale Nuksan – मोबाइल से होने वाले दुष्परिणाम

आज हम बात करने वाले हैं Mobile Se Hone Wale Nuksan के बारे में. मोबाइल अर्थात गतिशील संचार यंत्र जिससे सूचनाओं के प्रेषण की गतिशीलता संपन्न होती है. आज के भौतिकवादी युग में इंसान ने बहुत कुछ पाया है परंतु उससे ज्यादा खोया भी है. कुछ दशक पहले बगैर मोबाइल के लोग अपनी सूचनाओं का आदान-प्रदान भली-भांति कर लेते थे. और उस समय लोगों के मानवीय संवेदनाएं मौजूद हुआ करती थी. लोग बड़े ही इसने थे अपने तो से अपनी बातों को सम्मानजनक ढंग से प्रेषित करते रहते थे तथा अपनी भावनाओं को बड़े ही बेहतर ढंग से प्रस्तुत करते थे.

आज मोबाइल इस्तेमाल करने वाला हर व्यक्ति झूठ और मक्कारी आसानी से सीख गया है. क्योंकि वह होता है लखनऊ में तो बताता है फैजाबाद में. मोबाइल कंपनियां मानवता को कर रही है तार तार और इंसान को बना रही है अति उपभोक्तावादी. मोबाइल और इंसान की घनिष्ठता और निकटता अपने किसी निजी रिश्ते से भी ज्यादा हो गई है. जो भविष्य में देने वाली है गंभीर शारीरिक एवं मानसिक रोग हाइपरटेंशन, ब्लड प्रेशर, बहरापन, स्मरण शक्ति का ह्रास, अनिद्रा, हृदय रोग इत्यादि. इसीलिए सभी बुद्धिजीवियों को इस विषय पर समय से सचेत होकर चिंतन करने की आवश्यकता प्रतीत हो रही है.

Mobile Se Hone Wale Nuksan (Side Effects)

Mobile Companies अपने लोक लुभावने विज्ञापनों के जरिए भावी पीढ़ी को बहुत ही रोचक ढंग से प्रभावित कर रही है. छात्रों के द्वारा मोबाइल का अति प्रयोग उन्हें बना रहा है आलसी, फूहड़, अशिष्ट तथा रोगी. आज के अभिभावक अपने बच्चों को महंगे से महंगे मोबाइल उपलब्ध कराना अपनी शान समझ रहे हैं. परंतु क्या उन्होंने संज्ञान में लिया कि उनके बच्चे इस संचार यंत्र का उपयोग कैसे कैसे और किन किन रूपों में कर रहे हैं. क्या अभिभावकों को इस संचार यंत्र के उपयोग करने की तकनीकी एवं प्रयोग सीमा बच्चों को बताना उनका नैतिक एवं पुनीत कर्तव्य नहीं है? क्या उन्हें पता है Mobile Se Hone Wale Nuksan क्या हैं…..?

छात्रों पर सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह है कि छात्र मोबाइल लेकर क्लास रूम में बैठते हैं. उनका खुद का ध्यान भंग तो होता ही है साथ ही साथ इसे पूरा क्लासरूम असहज हो जाता है. टीचर भी उससे प्रभावित होता है और उसकी सकारात्मक अध्यापन अभिवृद्धि क्षतिग्रस्त हो जाती है. छात्र इस संचार यंत्र पर उपलब्ध इंटरनेट की सुविधा का दुरुपयोग कर ऐसी ऐसी यौन शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं जिसके लायक शायद उनकी अभी उम्र भी नहीं है. इसी के परिणाम स्वरूप उनमें जबरदस्त आवारागर्दी एवं वितरित मानसिकता विकसित हो रही है. क्यों ना उनके हित में है ना परिवार के ना सभ्य समाज के और ना दे सके इसलिए इन सब बात पर विराम लगना चाहिए.

अभिभावकों को अपने बच्चों के स्वस्थ शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए सचेत होना ही पड़ेगा. किशोरावस्था तूफान एवं दबाव की अवस्था होती है. ऐसे में अभिभावकों को सुविधा मुहैया कराना ही अपना कर्तव्य ना समझ कर बच्चों को समय-समय पर सचेत करते रहना चाहिए. जिससे उनका भटकाव प्रतिशत कम से कम हो और तभी हम एक संस्कारित परिवार एवं स्वस्थ समाज की कल्पना कर सकते हैं. हालांकि उपरोक्त विडंबना ओं के बावजूद मोबाइल उपयोगी वस्तु बन चुकी है, और यह लाभदायक भी है अगर इसका सटीक एवं सही प्रयोग किया जाए.

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