Sacchi Mitrata Kya Hoti Hai? सच्ची मित्रता क्या है?

आज हम बात करने वाले हैं Sacchi Mitrata Kya Hoti Hai? सच्ची मित्रता क्या है? के बारे में. मित्रता एक पवित्र भावना है, जिसके तहत एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति से स्नेह, लगाओ, प्रेम की अनुभूति होती है. मित्रता निश्चल, निर्मल, निष्काम, निर्विकार, निष्कपट तथा शुद्ध होनी चाहिए. मित्रता के कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिन्हें हम सच्ची मित्रता कह सकते हैं.

महाभारत में दुर्योधन और कर्ण की मित्रता सच्ची मित्रता थी. सूत पुत्र कहकर कर्ण की जगह जगह उपेक्षा होने लगी. इससे दुर्योधन ने कर्ण को अंग देश का राजा घोषित कर दिया. पुत्र कर्ण अब अंगराज कर्ण बन गया. राजा कर्ण ने अपना पूरा जीवन दुर्योधन को निश्चल भाव से समर्पित कर दिया. कृष्ण सुदामा की मित्रता आज भी बेमिसाल है. मित्र सुदामा के आने का समाचार पाकर भगवान श्री कृष्ण पैदल भागकर सुदामा को गले से लगाते हैं. यह मित्रता सच्ची मित्रता का एक अच्छा उदाहरण है.

रामायण में सुग्रीव-हनुमान मित्रता, राम-सुग्रीव मित्रता उल्लेखित रही है. हनुमान जी के प्रयास से सुग्रीव की मित्रता भगवान राम से हुई. भगवान राम ने सुग्रीव को उसके हड़प ले गए राज्य को दिला कर मित्रता निभाए. सुग्रीव ने मैत्री भाव से सैनिक मदद देकर एवं स्वयं युद्ध में भाग लेकर अपने दायित्व को पूर्ण किया. मित्रता में कोई जाति, कोई धर्म, धन, रूप, रंग आदि आड़े नहीं आना चाहिए क्योंकि प्रेम की उत्पत्ति हृदय से होती है. हृदय से मित्रता होनी चाहिए सभी जीव ईश्वर की संतान हैं और सभी के अंतः करण में ईश्वर (परमात्मा) का वास है. फिर तो पूरा जगत ही मित्रता करने योग्य है.

Sacchi Mitrata Kya Hoti Hai? सच्ची मित्रता क्या है?

शिवाजी-तानाजी मालुसरे की मित्रता हमारे समक्ष एक मिसाल पेश करती है. एक बार शिवाजी की माता जीजाबाई ने शिवाजी से रायगढ़ का दुर्ग मांग लिया जो उस समय मुगलों के आधिपत्य में था. शिवाजी जानते थे कि यह कार्य कठिन है क्योंकि उस दुर्ग का सेनापति एक अत्यंत भयानक पिता का योद्धा था. उससे युद्ध करके दुर्ग को अपने कब्जे में करना आसान नहीं था. इसके लिए उन्होंने तुरंत एक पत्र लिखकर मित्र मालपुरा के पास भेजा.

उन दिनों माल सुरे अपने बेटी के शादी के कार्यों में लगा था. तैयारियां चल रही थी मित्र शिवाजी का पत्र पाकर शादी की तैयारियां छोड़ तानाजी तुरंत चल पड़े. रणभूमि में भयंकर युद्ध करते हुए उनकी तलवार उस दैत्याकार मुग़ल पर और उसकी तलवार इनकी गर्दन पद पड़ी. अंततः विजय मिली, दुर्ग पर सेना ने कब्जा कर लिया परंतु उस मुग़ल के साथ-साथ तानाजी मालुसरे भी मारे गए. विजय का समाचार पाकर शिवजी फूले न समाये और विजय पताका फहराने जा पहुंचे. पहुंचते हे मृत्यु का समाचार सुनकर वे स्तब्ध रह गए और उनके मुख से निकल पड़ा- “गढ़ आया पर सिंह गया”.

अर्थात दुर्ग तो मिला परंतु शेर जैसा मित्र शहीद हो गया. इस भौतिकवादी युग में सच्चा बंधु मिलना अधिक दुष्कर है. स्वार्थपरता बढ़ गई है. अंग्रेजों ने फूट डालने के लिए झूठे मित्रता की एवं समय आने पर अपने मित्रों को भी छोड़ा. इस राजनीतिक युग में शत्रु मित्र की पहचान नहीं हो पाती है. आज जो घनिष्ठ मित्र है वही कल स्वार्थ ना सिद्ध होने पर दुश्मन बन जाता है. एक अच्छे मित्र की पहचान निम्न प्रकार से होती है.

उत्सवे   व्यसने   प्राप्ते  दुर्भिक्षे  शत्रु   संकटे  |
राजद्वारे स्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः ||

अर्थात उत्सव में (सुख में), व्यसन होने पर (बुरी आदत पड़ने पर), दुर्भिक्ष (अकाल में), एवं शत्रु द्वारा संकट में पढ़ने पर राज द्वार (न्यायालय) में, श्मशान में जो साथ दे वही अच्छा मित्र है.

जिस प्रकार औषधि से रोग का छुटकारा मिल जाता है उसी प्रकार एक मित्र हंस जीवन के दुर्गुण रूपी रोगों से छुटकारा दिलाता है. वह अनुचित तथा व्यर्थ के कार्यों से हमें बचाता है. विश्वासपात्र मित्र हमारे जीवन में एक दीपक की तरह रहता है जिससे सारे अवगुण रूपी अंधकार दूर हो जाते हैं. दुष्ट लोगों की मित्रता अस्थाई होती है जबकि सज्जनों की स्थाई एवं निस्वार्थ. निम्नलिखित श्लोक इन दोनों प्रकार की मित्रता को स्पष्ट करता है-

आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण,लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात्।
दिनस्य पूर्वार्ध-परार्धभिन्ना, छायेव मैत्री खल सज्जनानाम्।।

इसमें दुष्टों की मित्रता की तुलना दोपहर के पहले तक तथा सज्जनों की मित्रता दोपहर के बाद तक बनने वाली छाया से किया गया है. अर्थात जिस प्रकार सूर्योदय के समय छाया बहुत बड़ी बनती है परंतु धीरे-धीरे कम होकर दोपहर को अत्यल्प बचती है उसी प्रकार दोस्त जनों शूद्र चित्र वालों की मित्रता पहले बहुत बड़ी बाद में बहुत कम हो जाती है. इसके विपरीत दोपहर के बाद छाया बढ़ती हुई शाम को बहुत बढ़ जाती है उसी प्रकार सज्जनों की शुरुआती मित्रता छोटी परंतु बाद में अत्यंत घनिष्ठ हो जाती है.

स्पष्ट है कि मित्रता एक अत्यंत प्रचलित शब्द है तथा मित्रों की आवश्यकता भी सबको पड़ती है. मित्रों की पहचान संकट के समय ही हो पाती है. रहीम जी के अनुसार-

रहिमन विपदा हू भली, जो थोड़े दिन होय
हित अनहित या जगत में, जान परत सब कोय।।

अर्थात विपत्ति के समय ही हित-अनहित की पहचान होती है. गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी यही कहा है-

धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी।।

अर्थात मित्र की परीक्षा आपत्ति में ही होती है. अतः यदि हम मित्र बनाना चाहते हैं तो उसे ठीक तरह आजमाने के बाद बनाना चाहिए तथा यदि हम किसी के मित्र हैं तो मित्रता में किसी प्रकार की भी आंच नहीं आने देना चाहिए.

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